दशहरा अथवा विजयदशमी



 दशहरा

भारतवर्ष त्योहारों का देश है। विभिन्न त्योहारों में से एक दशहरा यानी की विजयादशमी जिसे हर वर्ष हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आश्विन माह की दसवीं (जो कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार सितंबर या अक्टूबर में होता है) को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन हथियारों और उपकरणों की पूजा की जाने के कारण इसे आयुध पूजाके नाम से भी जाना जाता है। दशहरा का यह पर्व अवगुणों को छोड़ कर श्रेष्ठ, अच्छे और सद्गुणों को अपनाने के लिए हम सभी को प्रेरित करता है।

 दशहराया विजय दशमी मनाने के पीछे की कथा

 हिंदू मान्यताओं के अनुसार प्रभु श्री राम ने 9 दिनों की लड़ाई के बाद दानव राजा महापंडित लंकाधिराज रावण को मार डाला और अपनी पत्नी देवी सीता को उनके कैद से मुक्त कराया था, इसी उपलक्ष्य पर दसवे दिन दशहरा का विशेष उत्सव मनाया जाता है।

दूसरी मान्यता के अनुसार इस दिन देवी दुर्गा ने राक्षस महिषासुर को मार डाला और अधर्म पर धर्म की नींव रखी, इसलिए ये दिन आज भी विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन लोग देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं और शक्ति का वरदान मांगते हैं, ऐसा भी मान्यता है कि भगवान श्री राम ने स्वयं 108 कमलो के साथ देवी दुर्गा की कठोर तपस्या की थी”; जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें लंका पर विजय दिलाई थी।

चूकि, यह त्योहार ना सिर्फ एक विशेष धर्म समुदाय का है बल्कि यह हमें बुराई पर अच्छाई की जीत, और अधर्म पर धर्म की स्थापना का भी नैतिक संदेश भी देता हैं।

पंचांग के अनुसार इस वर्ष दशहरा का पर्व 15 अक्टूबर 2021 को मनाया जाएगा। इस दिन चंद्रमा मकर राशि और श्रवण नक्षत्र रहेगा। दशहरा का पर्व दिवाली से ठीक 20 दिन पहले आता है।दशहरा पूजा का शुभ मुहूर्त 2021की बात करें तो इस साल हिन्दू पंचांग के मुताबिक दशहरा की पूजा 15 अक्टूबर 2021 को दोपहर के 02 बजकर 02 मिनट से लेकर 02 बजकर 48 मिनट तक विजय दशमी का मुहूर्त रहेगा।

 दशहरा के त्योहारमनाने के तरीके :

दशहरा का यह दिन इतना शुभ माना जाता है कि कई लोग अपनी ज़िन्दगी में आज ही के दिन नई शुरुआत करते हैं। कई लोग अपना काम, व्यवसाय, लेखन का काम, किसी नए उद्योग की शुरुआत करते हैं। कई किसानों द्वारा यह भी माना जाता है कि दशहरा के दिन से ही उनकी खेती के दिन भी शुरू होते हैं। लोगों का यह मानना है कि इस दिन पर शुरुआत किए गए हर काम सफल होते हैं। पुराने समय में राजा महाराजा विजयदशमी या दशहरा के दिन ही मां दुर्गा की पूजा करने के बाद अपने युद्ध के लिए निकलते थे। आज के समय में भी इस दिन रावण के पुतले जलने के बाद लोग उस अग्नि में मां दुर्गा से अपने अंदर की बुराइयों को खत्म का आशीर्वाद और शक्ति मांगते हैं। कई जगहों पर नवरात्रि के नौ दिनों के साथ साथ विजयदशमी या दशहरा के दिन भी कई तरह के भव्य मेले लगाए जाते हैं जहां रावण और भगवान राम की मूर्तियों और उनके युद्ध से जुड़ी कई चीजें मिलती हैं। कई जगहों पर भगवान श्री राम और रावण के युद्ध और अच्छाई पर बुराई की जीत को समझने के लिए रामलीला का भी आयोजन कराया जाता है जो कहीं कहीं दस दिनों तक भी होता है। दशहरा वाले दिन कई लोग महाशक्ति देवी दुर्गा मां और महिषासुर के युद्ध को भी नाटक के रूप में लोगों के सामने लाते हैं। इससे हमें यह संदेश मिलता है कि चाहे समय कोई भी हो हर समय अच्छाई की जीत होती है और बुराई का नाश होता6 है।

 

दशहरा पर्व के विषय में महत्वपूर्ण तथ्य

कई किंवदंतियों के अनुसार यदि दानव राजा रावण का वध भगवान श्री राम ने नहीं किया होता तो सूर्य हमेशा के लिए अस्त हो जाता।

असुरों के राजा महिषासुर का वध महाशक्ति दुर्गा मां ने युद्ध के दसवें दिन ही किया था और इसी रूप में भी दशहरा का महत्व है।

महिषासुर असुरों को राजा था, जो लोगों पर अत्याचार करता था और उसके किए जा रहे अत्याचारों को देख कर भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्‍णु और भगवान महेश ने महाशक्ति (माँ दुर्गा) का अपने शक्तियों द्वारा निर्माण किया। महिषासुर और महाशक्ति (माँ दुर्गा) के बीच 10 दिनों तक युद्ध हुआ और आखिरकार मां ने 10 वें दिन असुरों के राजा महिषासुर पर विजय हासिल कर ली।

पश्चिम बंगाल में इस दशहरा पर्व को लेकर यह भी मान्यता है कि नवरात्र नौ दिनों के लिए महाशक्ति दुर्गा मां अपने मायके आती हैं और सभी लोग नवरात्र के बाद दसवें दिन यानि विजयदशमी के दिन ही माता रानी की मूर्ति को पानी में विसर्जित कर के उनकी विदाई की जाती है।

अन्य मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री राम ने रावण के दसों सिर यानी उसकी दस बुराइयों को ख़त्म किया जो आज के समय में भी हमारे अंदर पाप, काम, क्रोध, मोह, लालच, स्वार्थ, घमंड, जलन, अमानवता, अहंकार और अन्‍याय के रूप में विराजमान है।

दशहरा भगवान श्री राम और माता दुर्गा दोनों का महत्व दर्शाता है। रावण को हराने के लिए श्री राम ने मां दुर्गा की पूजा की थी और आर्शीवाद के रूप में मां ने रावण को मारने का रहस्‍य भगवान श्री राम को बताया था।

 




दशहरा पर्व का महत्व :

दशहरा हिन्दुओं के सभी पर्वों में से एक मुख्य पर्व है। दशहरा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार है, लेकिन भारत में यह पर्व सभी धर्मों द्वारा समान उत्साह और बड़े ही उल्लास के साथ पूरे देश मे मनाया जाता है। यह त्योहार हमें हमेशा बुराई पर सच्चाई और अच्छाई की जीत के बारे में बताता है। यह रावण पर भगवान श्री राम की अच्छाई के जीत के सम्मान में पूरे देश भर में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। देश के अलग अलग हिस्सों में दशहरा का यह त्योहार कई अलग अलग तरीकों से मनाया जाता है। पंजाब और भारत के उत्तरी हिस्से में यह दशहरा उत्सव लगभग दस दिनों तक जारी रहता है। जहां शुरू के 9 दिनों में लोग देवी मां, महाशक्ति मां दुर्गा की उपासना करते हैं एवं अंतिम दिन रावण दहन द्वारा उत्सव की समाप्ति की जाती है। मैसूर में भी दशहरा बहुत प्राचीन समय से मनाया जा रहा है, मैसूर के राजा के द्वारा 17वीं शताब्दी में मैसूर में दशहरा मनाई गयी थी। तमिलनाडु में इसे अयोध्या पूजा के रूप में मनाया जाता हैं। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और भारत के दक्षिणी हिस्सों में इसे आयुध पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन राक्षस राजा का वध करने के बाद, हथियारों को पूजा के लिए बाहर रखा जाता है। देवी दुर्गा के साथ साथ अस्त्रों की भी पूजा की जाती है। दशहरा सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है बल्कि अन्य देशों में भी दशहरा काफी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मलेशिया में दशहरा पर राष्ट्रीय अवकाश होता है और बांग्लादेश और नेपाल में भी यह दशहरा पर्व बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है।

 


निष्कर्ष :

दशहरायानी कि विजयादशमी एक ऐसा पर्व है, जिसकी वजह से लोगों के मन में नई ऊर्जा, बुराई पर अच्छाई की जीत की भावना, ग़लत कामों से दूर रहने और लोगों के मन में नई चाह और सात्विक ऊर्जा भी ले कर आता हैं। नई दिनों तक देवी माँ के पूजा अर्चना के बाद विजयादशमी का यह महत्व दिन आता है। इस दिन सभी के घरों में कई अलग अलग तरह के मिठाइयां और पकवान बनाये जाते हैं। इसके साथ ही लोग नए पोशाक पहनते हैं और आस पास बने दशहरा के पंडालों में देवी मां के दर्शन करते हैं और अपने अंदर पैदा की हुए बुराइयों पर जीत पाने के लिए देवी मां का आशीर्वाद लेते हैं।

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